Wednesday, 5 November 2014

Judaayi

है अनोखी शाम, ढलते सूरज में आज कुछ नया है।
एक शरारत सी है हवा में, हर पत्ता मदमस्त झूम रहा है।
एक किताब और कुछ गीत हों, तो लगे की जन्नत है बस यहीं।
पर बीत गए वह दिन, ये सब है और तन्हाई भी, पर मैं खुश नहीं।
पूछ रही हैं खामोशियाँ, आखिर क्यों हो यूँ उदास?
आँसू लिए तन्हाई कर रही शिकायत, क्या हुआ जो मैं नहीं आ रही रास?
कैसे समझाऊँ मैं इन्हे, कुछ ऐसे छिड़े हैं दिल के तार,
अब हर वह जन्नत जहन्नुम है, जहाँ मेरे पास ना हो मेरा यार।