वक्त की रेत समेट, मोहब्बत का एक बीज बोया।
मुस्कुराहट की खाद डाली, आँसुओं से सींचा।
मौसम गुज़रे, बीज पौधा, पौधा पेड़ हुआ।
जड़ें मज़बूत, बांधी रेत को, वक्त स्थिर हुआ।
बसंत के फूल, हवाओं, से उन्होने जी बहलाया।
पर जब फूल फल हुए, उन्हे कुछ रास न आया।
अब अपने ही गिरे पत्तों फूलों फलों की खाद है।
मेरे नहीं, कैद वक्त के आँसुओं की मोहताज है।
एक दिन ये खाद - पानी भी दग़ा दे जाएगा।
कैद रेत रिहा होगी, और सब खत्म हो जाएगा।
मुस्कुराहट की खाद डाली, आँसुओं से सींचा।
मौसम गुज़रे, बीज पौधा, पौधा पेड़ हुआ।
जड़ें मज़बूत, बांधी रेत को, वक्त स्थिर हुआ।
बसंत के फूल, हवाओं, से उन्होने जी बहलाया।
पर जब फूल फल हुए, उन्हे कुछ रास न आया।
अब अपने ही गिरे पत्तों फूलों फलों की खाद है।
मेरे नहीं, कैद वक्त के आँसुओं की मोहताज है।
एक दिन ये खाद - पानी भी दग़ा दे जाएगा।
कैद रेत रिहा होगी, और सब खत्म हो जाएगा।
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