Thursday, 8 September 2016

Likhta Hun

कल शाम कुछ दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ हुआ, जो अर्सों बाद उनसे टकरा गए।
मुस्कुरा कर सलामती पूछी उन्होंने मगर, हैरत में कह गए -
"हाल ही पता चला तुम लिखते हो! पहले कभी ज़िक्र क्यों नहीं किया?"
जवाबी मुस्कान का दीदार कर वो चल दिए, छुपे दर्द का बयान शायद अब पढ़ें।

जो एक दफे मेरे कमरे के बिखरेपन को नहीं, बिखरे पन्नों को देखा होता,
जो एक दफे तोहफ़े में पेशे कोट के लेबल को नहीं, जेब में रखा खत पढ़ा होता,
जो मेरे अल्फ़ाज़ों में गुज़रे वक़्त का हिसाब न मांग कर, अलफ़ाज़ मांगे होते,
जो कमीज़ पे नीले धब्बों के राज़ मांगे होते, तो आज तुम्हे हैरत न होती।

शुक्रिया फिर भी अदा करूँगा उन्हें, जो उनकी बेज़ारी ने जूनून ऐसा दिया,
की लफ़्ज़ों को बेहतर करने की चाह में सराबोर हो गया। और अंजाम ये हुआ,
की नज़्मों की दुनिया में एक मामूली चिराग़ ही सही, नज़रें मेरी उस शम्स पे हैं,
और उनकी इस हैरत ने आज उस चिराग़ की लौ को एक नयी जान दी है।

0 comments:

Post a Comment