उमड़ आये बादल आज, सर्द हवाएं चलीं,
पहली बारिश की सौंधी खुशबू फ़िज़ा में घुली।
आदत से मजबूर, दिल फिर फिसल गया,
पर उस पगली के "तो ?" ने आलम का क़त्ल कर दिया।
वो पगली कहती है, "नहीं पसंद ये बारिशें,
"तो इन हवाओं, बूंदो, मौसम से न जोड़ो मुझे।"
जो छटे बादल कुछ पहर बाद, और धूप खिली,
तो पगली ने कहा "धूप का नाम न लेना मेरे सामने कभी।"
वो पगली कहती है, "नहीं पसंद ये गर्मियां,
"तो मत रखो मुझे इन खुले आसमानों के दर्मियाँ।"
हार गया ये दिल, थक क पूछा "तो क्या करूँ ?"
हँस पड़ी वो हसीन, कहा की भाड़ में जाऊँ और डूब मरूं।
वो पगली कहती है "क्या ज़रूरत है इन तारीफों की?
"जो मौसमों से तोली जाए, नहीं ऐसी मेरी सीरत, नहीं ऐसी मेरी खूबसूरती।
"ये मालूम है मुझे की फ़िदा हो तुम मुझपे, मैं उनमें से नहीं जिन्हे तुम याद दिलाते रहो।
"और जो करनी हो कभी तारीफ़ मेरी, बस चार सच्चे लफ़्ज़ों के लिए अपना मन टटोलो।"