Saturday, 29 August 2015

Kasba

छोड़ आएं वह मिटटी के घरौंदे , चंद में ही वह जज़्बा होता है,
सफर करते राहगीरों का, ये अथाह आकाश ही क़स्बा होता है।

Sunday, 16 August 2015

Naya Zamana

समाँ ये गर तू समझे ऐ ग़ालिब तो बतलाना ज़रा,
कि तौहीन तेहज़ीब, और तेहज़ीब तौहीन क्यों हो गई।