जो किसी ने कहा बहुत बोलते हो तुम,
अब लफ्ज़ होठों से निकलते नहीँ।
जो किसी ने कहा उबाऊ हैं तुम्हारे किस्से,
अब कहानियाँ रहतीं अनकहीं।
जो किसी ने कहा बद्तमीज़ हो तुम,
अब शराफ़त कायम, सच्चाई नहीँ।
जो किसी ने कहा अहं है तुम में,
अहं तो क्या, अब आत्म ही नहीँ।
जो थे कभी अपने, उन्होंने ग़ैर कर दिया,
अब ज़रूरत किसी को, मेरी रही नहीँ।
कहूँ क्या? करूँ क्या? आखिर दोष उनका नहीँ ,
महफ़िल में खो चूका खुद को, एकांत में शायद मिल जाऊँ कहीं।