Wednesday, 3 May 2017

To Kya Hua

थके जो आज हम, तो क्या हुआ !
मशरूफ़ लम्हों का दिन, तो क्या हुआ !
ज़िक्र से याद आई, यादों का ज़िक्र हुआ,
दिल भर आया, नीयत नहीं, तो क्या हुआ !
और गर ये शायरी रास न आई, तो क्या हुआ !
वो हसी, वो लाली, खिल न पाई, तो क्या हुआ !
नींद बेपर्दा कर सपनों में आऊँगा,
हक़ीक़त में बात बन न पाई, तो क्या हुआ !

Saturday, 8 April 2017

Dil

यूँ प्यार के बयान, मेरे महबूब, मेरे दिल से ना माँग।
दीवाना तेरे इश्क़ की दरगाह का नमाज़ी है,
तेरे कटघरे में खड़ा मुजरिम नहीं।

Friday, 3 February 2017

Pyaar

वक्त की रेत समेट, मोहब्बत का एक बीज बोया।
मुस्कुराहट की खाद डाली, आँसुओं से सींचा।
मौसम गुज़रे, बीज पौधा, पौधा पेड़ हुआ।
जड़ें मज़बूत, बांधी रेत को, वक्त स्थिर हुआ।
बसंत के फूल, हवाओं, से उन्होने जी बहलाया।
पर जब फूल फल हुए, उन्हे कुछ रास न आया।
अब अपने ही गिरे पत्तों फूलों फलों की खाद है।
मेरे नहीं, कैद वक्त के आँसुओं की मोहताज है।
एक दिन ये खाद - पानी भी दग़ा दे जाएगा।
कैद रेत रिहा होगी, और सब खत्म हो जाएगा।