थके जो आज हम, तो क्या हुआ !
मशरूफ़ लम्हों का दिन, तो क्या हुआ !
मशरूफ़ लम्हों का दिन, तो क्या हुआ !
ज़िक्र से याद आई, यादों का ज़िक्र हुआ,
दिल भर आया, नीयत नहीं, तो क्या हुआ !
और गर ये शायरी रास न आई, तो क्या हुआ !
वो हसी, वो लाली, खिल न पाई, तो क्या हुआ !
नींद बेपर्दा कर सपनों में आऊँगा,
हक़ीक़त में बात बन न पाई, तो क्या हुआ !