Thursday, 8 September 2016

Likhta Hun

कल शाम कुछ दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ हुआ, जो अर्सों बाद उनसे टकरा गए।
मुस्कुरा कर सलामती पूछी उन्होंने मगर, हैरत में कह गए -
"हाल ही पता चला तुम लिखते हो! पहले कभी ज़िक्र क्यों नहीं किया?"
जवाबी मुस्कान का दीदार कर वो चल दिए, छुपे दर्द का बयान शायद अब पढ़ें।

जो एक दफे मेरे कमरे के बिखरेपन को नहीं, बिखरे पन्नों को देखा होता,
जो एक दफे तोहफ़े में पेशे कोट के लेबल को नहीं, जेब में रखा खत पढ़ा होता,
जो मेरे अल्फ़ाज़ों में गुज़रे वक़्त का हिसाब न मांग कर, अलफ़ाज़ मांगे होते,
जो कमीज़ पे नीले धब्बों के राज़ मांगे होते, तो आज तुम्हे हैरत न होती।

शुक्रिया फिर भी अदा करूँगा उन्हें, जो उनकी बेज़ारी ने जूनून ऐसा दिया,
की लफ़्ज़ों को बेहतर करने की चाह में सराबोर हो गया। और अंजाम ये हुआ,
की नज़्मों की दुनिया में एक मामूली चिराग़ ही सही, नज़रें मेरी उस शम्स पे हैं,
और उनकी इस हैरत ने आज उस चिराग़ की लौ को एक नयी जान दी है।

Thursday, 30 June 2016

Main Nahin

जो किसी ने कहा बहुत बोलते हो तुम,
अब लफ्ज़ होठों से निकलते नहीँ। 
जो किसी ने कहा उबाऊ हैं तुम्हारे किस्से,
अब कहानियाँ रहतीं अनकहीं। 
जो किसी ने कहा बद्तमीज़ हो तुम,
अब शराफ़त कायम, सच्चाई नहीँ। 
जो किसी ने कहा अहं है तुम में,
अहं तो क्या, अब आत्म ही नहीँ। 
जो थे कभी अपने, उन्होंने ग़ैर कर दिया,
अब ज़रूरत किसी को, मेरी रही नहीँ। 

कहूँ क्या? करूँ क्या? आखिर दोष उनका नहीँ ,
महफ़िल में खो चूका खुद को, एकांत में शायद मिल जाऊँ कहीं। 

Friday, 20 May 2016

Gum (Lost)

कभी बारिशों में दिल पन्नों पर उतर आता था,
अब वो बूँदें इस दिल को जगा नहीं पातीं।
कभी शब्दों की दौलत से आबाद था ये मन,
अब चाह कर भी ये कलम उठा नहीं पाता।

जो अपनी धुन में चलते थे हाथ कहीं खो गए,
दूसरों की आशाओं में अपने अरमान खो गए।
कुछ बीती, जो बीती, सो बात गई ,
पर न जाने कब कोई बात रह ही न गई।

अब स्याही भी ग़ैराना बर्ताव करती है,
इस खोखलेपन के साये में सूखने से डरती है।
रूठे पन्नों, स्याहियों, कलमों को मनाऊं कैसे?
खो गया रूह का रास्ता, उसे फिर पाऊं कैसे?